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मेरे पास आओ मेरे दोस्तों, एक किस्सा सुनाऊं...

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मैं खुद को ढूंढ रहा हूं...

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sumit-walking-aloneमैं खुद को ढूंढ रहा हूँ,

कौन हूं मैं, क्यां हूं मैं,

ये खुद से पूछ रहा हूँ,

मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ…।

आँखों में सपने लिए

घर से निकल पड़ा हूँ,

कहां हैं मेरी राहें, कहां हैं मेरी मंजिल

अपने वजूद को ढूंढ रहा हूँ,

अनसुलझे प्रश्न हैं कई

उनके उत्तर ढूंढ रहा हूँ,

मै खुद को ढूंढ रहा हूं…।

भीड़ से खुद को कैसे अलग दिखाऊं,

जीवन की दौड़ में कहीं पिछड़ न जाऊं,

अपने अंर्तद्वंद्व से लड़ रहा हूँ,

मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ…।

हारा हूँ कई बार पर कमजोर नहीं हुआ,

लाख गलतियां की हैं पर अफसोस नहीं हुआ,

बस अब हर कदम पर जीतने की चाह है,

वही मेरी मंजिल वही मेरी राह है,

चाहत को इरादा बनाया है,

कमजोरी को ताकत बनाया है,

पूरे हुए अरमां, मिल गई मंजिल,

अब नई मंजिल के लिए निकल पड़ा हूँ

नई राहें हैं, नई मंजिल हैं,

पर प्रश्न अब भी है वही,

कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं,

ये खुद से पूछ रहा हूँ,

खुद को ढूंढ रहा हूँ,

मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ…

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kmmishra के द्वारा
June 9, 2010

बहुत खूब सुमित जी । अच्छी रचना है । सच बता रहा हूं । बहुत कोशश के बावजूद भी मैं कविता नहीं लिख पाता हूं । कवि होना एक सुंदर, निश्छल और कोमल हृदय की निशानी होती है । कवि का भावुक हृदय प्रेम से लबालब होता है । अदिति जी का बड़प्पन है जो उन्होंने मुझे इस काबिल समझा । मैं तो अभी खुद ही व्यंग्य विधा का अदना सा विद्यार्थी हूं । हास्य व्यंग्य समझने के लिये आपको व्यंग्य सम्राट हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्री लाल शुक्ल, रविन्द्र नाथ त्यागी की रचनाएं पढ़नी चाहिये । आप मेरे दूसरे ब्लाग “सुदर्शन” पर आयें । (www.kmmishra.tk ) इसके एक अलग पेज “हिन्दी की श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ” पर मैंने इन महान व्यंगकारों की रचनाएं रखी हुयी हैं । आपको उन्हें पढ़ कर आनंद भी आयेगा ओर कुछ दृष्टि भी मिलेगी ।

    sumityadav के द्वारा
    June 10, 2010

    मिश्राजी, आपकी प्रतिक्रिया एवं मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद। आपके मार्गदर्शन से निश्चित रूप से बेहतर लिख  पाउंगा। आपका सुदर्शन ब्लाग बहुत शानदार है। खासतौर से आप अपने पोस्ट के साथ एनीमेशन डाकर उसे जीवंत कर देते हैं। बधाई। आपसे एक चीज और पूछना है कि हिंदी में टाइप करते समय inverted comma कैसे लगाऊं।

sumityadav के द्वारा
June 9, 2010

राजकमल भाई, सर्वप्रथम आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। दरअसल इंसान खुद को कभी खोज ही नहीं पाएगा। इंसान और जीवन ऐसी पहेलियां हैं जिन्हें बूझना  नामुमिकन है। हर दिन कुछ नया लेकर आता है। हम रोज कुछ सीखते हैं और सिखाते भी हैं।  हम एक ही समय पर शिक्षक भी हैं और शिष्य भी। ये जिंदगी सबसे बड़ी गुरू है। इसलिए इस पहेली को तो कोई नहीं बूझ पाएगा। बस इस अमूल्य जीवन का आनंद लीजिए।

rajkamal के द्वारा
June 9, 2010

यार अभी तो में खुद को ढूंड रहा हु- जब अपना पता मिलेगा तो तुम्हारा भी बता देंगे- कहे को preshan होते हो मेरे भाई -

aditi kailash के द्वारा
June 9, 2010

मोहन जी (k m mishra ji) को पढ़े, बहुत अच्छा लिखते है वो…..

    sumityadav के द्वारा
    June 9, 2010

    अदितीजी, मोहनजी की कविताएं मैं अवश्य पढ़ूंगा और उनसे जरूर सीखूंगा।

aditi kailash के द्वारा
June 9, 2010

अच्छा प्रयास………आप अपने हास्य व्यंग्य पर ज्यादा ध्यान दे…….और कविता भी लिखना है तो हास्य व्यंग्य पर ही लिखे……… आपके हास्य-व्यंग्य के कांसेप्ट अच्छे हैं……..

    sumityadav के द्वारा
    June 9, 2010

    अदितीजी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्वाद। दरअसल मैं कुछ ही दिनों पहले ब्लागिंग शुरू की है। मैं कभी लेख, कभी हास्य व्यंग्य, कभी हिन्दी तो कभी  अंग्रेजी में लिखकर अपना रेंज हासिल करने की कोशिश कर रहा हूं। आज कविता लिखकर एक प्रयोग किया। मैं भी  महसूस कर रहा हूं कि मैं हास्य व्यंग्य और हास्य कविताओं में बेहतर कर सकता हूं।  कुछ दिनों बाद मैं शायर खुरापाती के नाम से हास्य कविताएं पोस्ट करने की सोच रहा हूं। 


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