मन के दरवाजे खोल जो बोलना है बोल

मेरे पास आओ मेरे दोस्तों, एक किस्सा सुनाऊं...

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काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसा (हास्य व्यंग्य),

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rain1ये तो सबको पता है कि मौसम विभाग भरोसे लायक बिलकुल नहीं है। इसलिए हम तो मौसम की भविष्यवाणी पर विश्वास ही नहीं करते। जब मौसम विभाग कहता है कि आज बारिश होने वाली है, उस दिन तो हम बेधड़क बिना छाते-रेनकोट के घूमते हैं क्योंकि हमें पता है बारिश नहीं होने वाली। लेकिन इस साल जब मौसम विभाग ने रो-रोकर उस पर विश्वास करने के लिए कहा तो हमारी दिल पसीज गया। आपको तो पता ही है हम कितने कोमलहृदयी हैं। मौसम विभाग का इस तरह रोज-रोज रोना हमसे देखा नहीं गया और हमने सोचा चलो इस बार इन पर विश्वास कर लेते हैं। प्रीमानसून बारिश हुई भी तब हमें लगा कि शायद मौसम विभाग ने सचमुच काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। दो दिन प्री-मानसून का ट्रेलर दिखाने के बाद मानसून नाम की फिल्म रिलीज ही नहीं हुई। काले बादल मंडराते और जीभ चिढ़ाकर चले जाते। जून बीता जुलाई आई लेकिन बारिश नहीं आई। मौसम विभाग एक बार फिर बेवफा निकल गई। खैर हमने इन सबके बारे में सोचना बंद किया और लात तानकर बिस्तर पर सो गए। आप तो जानते हैं हम कितने निद्राप्रेमी हैं।


हमें हम सपनों के समुंदर में गोते लगाने ही वाले थे कि मोहल्ले में जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज आने लगी। वैसे तो हमारे मोहल्ले में ये चिकचिक आम बात है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही आवाज आ रही थी। नींद में खलल हमसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी।  लेकिन तभी इस कोलाहल के बीच एक मीठी सी आवाज सुनाई देने लगी। कोई सुरीली आवाज में गा रहा थी- “काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसा।” मैं कौतूहलवश बाहर आया कि आखिर मेरे वीरान मोहल्ले में अप्सरा कहां से आ गई। मेरी मां हमेशा कहती हैं कि मुझे जैसे आलसी को सिर्फ मेरी बीवी ही ठीक कर सकती थी। उस अप्सरा की सुरीली आवाज में मुझे वही जादू दिखाई दिया जो मुझे आलस्य से बाहर निकाल सकता था। इधर-उधर देखा तो एक खूबसूरत सी लड़की भीड़ के बीच बड़ी मधुर आवाज में गाना गा रही थी। पता करने पर मालूम चला कि वह शर्मा की बेटी “राधा” है पढ़ाई पूरी करके कल ही आई है। coupleमुझे राधा में अपनी जीवनसंगिनी के दर्शन होने लगे। मैंने तो मन ही मन फैमिली प्लानिंग भी कर ली थी कि बच्चे दो ही अच्छे, लड़की का नाम होगा रिया और लड़के का राहुल। रिया डॉक्टर बनेगी और राहुल इंजीनियर। मैं हसीन सपने बुन ही रहा था कि पीछे से कोई मेरे कान मरोड़ने लगा। पलटकर देखा तो साहू आंटी थी। साहू आंटी चिल्लाकर बोली “अरे निकट्ठू, यहां खड़ा ही रहेगा कि मोहल्लेवालों के साथ इंद्रदेव की आराधना भी करेगा। देख नहीं रहा सब मोहल्लेवासी अपने-अपने तरीके से इंद्रदेव को मनाने में लगे हैं। मैं उधर महिलाओं के साथ भजन कर रही हूं। सारे पुरुष हवन कर रहे हैं। तू जा राधा के साथ फिल्मी गाने गाकर इंद्रदेव को रीझा। शायद तुम्हारे फिल्मी गाने से ही इंद्रदेव खुश हो जाएं।” इतना सुनना था कि मेरे मन में लड्डू फूटने लगे। अपना तो एक ही लक्ष्य था इंद्रदेव रिझे न रिझे मुझे कृष्ण बनकर राधा को रिझाना था। मेरे अंदर लगान का भुवन जाग गया मैं दौड़ता हुआ राधा के पास पहुंचा और उसके सुर के साथ सुर मिलाने लगा- “काले मेघा- काले मेघा, पानी तो बरसा। बिजली की तलवार की नहीं, बूंदो के बाण चला….” वैसे जब मैं गाता हूं तो कौवे भी शर्मा जाते हैं लेकिन उस दिन मैं किशोर कुमार से कम नहीं गा रहा था। अरे भई इंप्रेशन का सवाल था और आप तो जानते हैं ना “फर्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन”। मैं गायक तो नहीं, मगर ऐ हसीं जब से देखा मैंने तुझको, मुझको गायकी आ गई। मैंने गाना शुरू ही किया था कि जोरदार फुहार आने लगी। rain2सब लोग मेरी तरफ देखने लगे, मेरी राधा भी। सब लोग को लगने लगा कि मेरे गाने ने इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिया। अब ये तो इंद्रदेव ही जानते हैं कि वो मेरे गाने से खुश हुए या दुखी होकर आंसू बहाने लगे थे। खैर जो भी हो उस दिन मेरा इतना मान-सम्मान हुआ कि मैं इतने वर्षों तक हुए मेरे तिरस्कार को भूल गया।


image_angry_sunकुछ दिन बीते सूरज ने फिर आग बरसाना शुरू कर दिया। मोहल्लेवासी मेरे घर के सामने खडे़ होकर मेरे उठने का इंतजार करने लगे। इतने में राधा आई और उसने अपनी मीठी आवाज से मुझको उठाया। मैं खुश था, बहुत खुश। इतने सालों में पहली बार मैं बिना पापा की लात और मम्मी की डांट खाए उठा था। और मुझे उठानेवाली कौन थी, मेरी भावी जीवनसंगिनी राधा। मेरे तो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। मैंने बाहर आकर देखा तो साहू आंटी, शर्मा आंटी, गुप्ता आंटी सब हाथ में समोसे, जलेबी, लस्सी लिए मेरे स्वागत के लिए खड़ी थी। मैं सोचने लगा कल तक अगर मैं इनके पेड़ से आम भी तोड़ लेता था तो मोहल्ला सिर पर उठा लेती थी और आज इतनी खातिरदारी, आखिर बात क्या है? साहू आंटी आगे आई और बोली- “बेटा उस दिन तुम्हारे गाने ने इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिया था। तीन दिनों से फिर धूप ने कहर बरसाना शुरू कर दिया है। इसलिए हम लोगों ने इंद्रदेव प्रसन्नार्थ समिति बनाया है और तुम्हें इसका अध्यक्ष मनोनीत किया है।” मैंने सोचा, मैं और समिति का अध्यक्ष? आज तक मुझे किसी ने समिति का कार्यकर्ता तक नहीं बनाया और अब सीधा अध्यक्ष? मैं भावविभोर हो उठा। मैं एक भावपूर्ण भाषण देना चाहता था। लेकिन पता होता कि ये लोग मुझे अध्यक्ष बनाने वाले हैं कल रात को भाषण लिख लेता। खैर, अध्यक्ष होने के नाते मुझे कुछ तो कहना था, सो मैं गरजते हुए बोला- “देखिए, आप लोगों को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। अब मेरी अध्यक्षता में इंद्रदेव के प्रसन्नार्थ सारे हवन, यज्ञ, भजन किए जाएंगे। बारिश होकर रहेगी, ये मेरा वादा है। अब चूंकि उस दिन मेरे साथ राधा भी गा रही थी इसलिए मैं अध्यक्ष तो राधा उपाध्यक्ष। ” सभी लोग हां में सिर हिलाने लगे। दरअसल उनके पास कोई चारा भी नहीं था क्योंकि मुसीबत के समय तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। rain3


चूंकि अब मैं अध्यक्ष था और हर अध्यक्ष का यह नैतिक कर्तव्य होता है कि अपनी अध्यक्षगिरी दिखाए। रौब जमाए, पैसे बनाए, चोंचले दिखाए वरना आम लोगों को कैसे पत चलेगा कि ये अध्यक्ष है। मैंने भी अपना कर्तव्य निभाते हुए पापा से पैसे मांगे, शाम को उनकी बाइक मांगी और वो इनकार न कर सके। शाम को बाइक पर राधा को डेट पर ले गया। रेस्त्रां गए, खूब पैसे उड़ाए पापा के जो थे और मम्मी ने अलग से भी दिए थे और अगले दिन सुबह साथ फिल्म देखने का भी प्लान बना लिया। इसी तरह एक सप्ताह मौज-मस्ती में बीत गए। इंद्रदेव का तो पता नहीं लेकिन राधा मुझसे जरूर प्रसन्न हो गई थी। मोहल्लेवाले सुबह सुबह फिर मेरे घर के सामने खड़े हो गए और कहने लगे- “बेटा, हफ्तेभर बीत गए तुमने न तो हवन चालू किया, न पूजा-पाठ। कैसे करोगे इंद्रदेव को प्रसन्न।” मुझमें भी अब तक अध्यक्ष के पूरे गुण आ चुके थे। मैं बोला- “देखिए, वो अध्यक्ष ही क्या जो तुरंत काम कर दे, वो कार्यकर्ताओं का काम होता है। अध्यक्ष तो आराम से काम करते हैं।” इतने में एक चाचा निकल आए और बोले, बेटा आज कम से कम मेंढक-मेढकी की शादी ही करा दो। मैंने कहा ठीक है, ठीक है।


frogअब मैं मेंढक-मेंढकी ढूंढने के लिए निकल पड़ा। अब चूंकि मेंढक शहर में तो मिलने से रहे इसलिए मैं जंगल की ओर निकल प़डा और राधा से शादी की तैयारियां करने को कह गया। दोपहर से शाम हो गई लेकिन मेंढक-मेंढकी नहीं मिले। आखिर एक जगह मैंने मेंढक-मेंढकी देखे, एक सांप उनका शिकार करने की फिराक में था। जैसे ही सांप उन पर झपट्टा मारने लगा मैंने मेंढक-मेंढकी को हाथों में उठा लिया। सांप को अपना निवाला इस तरह छिनता देख बड़ा गुस्सा आया। उसने फुंकार भरी और मेरे पैर में डस दिया, मैं मेंढक-मेंढकी को हाथ में लिये वहीं गिर पड़ा। मैंने फिल्मों में देखा था कि सांप डसने के बाद कोई गांव की लड़की आती है और हीरो के पैर से जहर निकालती है। बस मैं भी उसी अवस्था में पड़ा रहा आदिवासी कन्या के इंतजार में जो मेरे पैर से सांप का जहर निकालेगी। आधे घंटे बीते, एक घंटा बीत गया लेकिन कोई नहीं आई। हमारे हाथों में जकड़े मेंढक-मेंढकी भी सोचने लगे कि ये किस निखट्टू से पाल पड़ गया, इतने देर में तो ये घर पहुंच गया होता। इतने में शेर के गुर्राने की आवाज आई, मैंने आव देखा न ताव बस घर के लिए दौड़ लगा दी। वैसे मुझे संशय है कि वो शेर की ही आवाज थी। जैसे-तैसे मैं अपने मोहल्ले पहुंचा। झट से मेंढक-मेंढकी को तैयार किया और शादी कराने लगे लेकिन इतने में ही चाचा ने आकर अड़गा डाल दिया। कहने लगे “अरे मनहूस, ये क्या कर रहा है। तू तो मेंढकों की शादी करा रहा है। ये दोनों मेंढक हैं।” पूरा मोहल्ला हंसने लगा। मुझे काटो तो खून नहीं। मैं संभला और बोला “अरे चाचा आपको ही मेंढकी की पहचान थी तो खुद की चले जाते।” इतना सुनते ही चाचा घर गए और मेंढकी को उठालकर ले आए। मेरे खून खौलने लगा। “अरे जब आपके पास मेंढकी थी तो मुझे जंगल में मरने के लिए क्यूं भेजा। मेरी तो जान पर बन आई थी।” मैं गुस्से के मारे चिल्लाने लगा लेकिन राधा का चांद सा मुखड़ा देखकर मेरा गुस्सा हवा हो गया।


अगले दिन कड़ी धूप में इंद्रदेव की आराधना करने का कार्यक्रम तय हुआ। सब लोगों को मेरे रूप में बकरा जो मिल गया था। इसलिए मुझे सुबह खूब खिलाया पिलाया गया और इसके बाद धोती पहनाकर चौक में कड़ी धूप में खड़ा कर दिया गया। और मुझे सख्त निर्देशित कर दिया गया कि चार घंटे मुझे इसी अवस्था में रहना है। अब क्या करें अध्यक्षगिरी हम पर हावी जो थी, हम मना न कर पाए। दोपहर के १२ बजे सूरज की तीखी धूप मुझ पर वार किए जा रही थी। नजर घुमाकर देखो तो सब के सब अपने घर में आराम फरमा रहे हैं। सब मुझे बलि का बकरा बनाकर घर में पकवान ठूंसने लगे। बंटी आइस्क्रीम खा रहा था, मोंटी बर्फ का गोला और रमेश मुझे क्रिकेट खेलने के लिए उकसाने लगा। मेरा तो मन किया कि ये आराधना-वाराधना छोड़कर भाग जाऊं मगर जैसे ही भागने की सोचता राधा खिडकी से मुस्कुराने लगती है मेरे विचार फिर बदल जाते। एक बड़ी साजिश के तहत राधा को खिड़की के पास बैठाया गया था ताकि मैं अपनी जगह से हिलूं नहीं। शाम के चार बज गए। इन चार घंटों में मेरे शरीर का रंग धूप से झुलसकर गेहूंए से लाल और फिर जलकर काला हो चुका था। अब बर्दाश्त की भी हद होती है। आखिर में मैं चक्कर खाकर वहीं गिर पड़ा। मैं अपेक्षा कर रहा था कि कोई तो आकर अपने प्रिय अध्यक्ष को उठाएगा लेकिन पूरा मोहल्ला दोपहर की नींद लेने में मस्त था, मेरी राधा भी। अंत में रेंगते-रेंगते मैं घर पहुंचा और जाते ही बिस्तर पर बिछ गया।


दो मिनट में आंख लग गई और मेरी “ड्रीम एक्सप्रेस” की गाड़ी शुरू हो गई। सपने में देखा कि मैं स्वर्ग में हूं, इंद्रदेव मेरे सामने खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं। उनकी मुस्कुराहट ने मेरी खीझ को बढ़ा दिया और मैं चिल्ला पड़ा, “ये क्या इंद्रदेव, आपके चक्कर में मेरी हालत पतली हो गई है और आप मुस्कुरा रहे हो? अगर अच्छे से बारिश करा देते तो मेरी ये हालत न होती। यहां हमारा शहर सूखा पड़ा है और वहां आप राजस्थान में बाढ़ ला रहे हो। एक जगह भरपूर पानी और दूसरी जगह अकाल। बारिश के मौसम में बरसात नहीं होती और ठंड में बौछारें मार देते हो। आपका तो पूरा टाइमटेबल ही गड़बड़ाया हुआ है। दो-तीन महीने अच्छे से पानी गिरा दो, आप भी खुश हम भी खुश।”  इंद्रदेव बोले, “मैं बारिश तो करवा दूं लेकिन पूरी पृथ्वी तो धूल और प्रदूषण से ढंकी हुई है और यहां से कुछ दिखाई ही नहीं देता। यहां से पानी छोड़ता हूं रायपुर के लिए और गिरता है राजस्थान में। कई बार तो एक ही जगह कई बार बारिश हो जाती है और कई जगह सूखे रह जाते हैं। मुझे तो तुम लोग दिखाई ही नहीं देते। अब इसमें मैं क्या कर सकता हूं, सब तो तुम लोगों का ही किया-धरा है। यकीन नहीं होता तो पलटकर देखो।” मैंने पलटकर देखा तो हक्का-बक्का रह गया। सचमुच पृथ्वी पर कुछ दिख ही नहीं रहा था। सिर्फ धूल और धुआं। फिर इंद्रदेव बोले “वैसे तो तुम निखट्टू हो लेकिन दिल के साफ हो, अगर तुम इस धुएं को हटा सकते हो तो बोलो, मैं तो बारिश करने के लिए अब भी तैयार हूं। ” मैं निरुत्तर था। मेरा गला सूखने लगा। मैंने धीरे से कहा, “देखिए, पूरे धुएं को तो मैं नहीं हटा सकता लेकिन अपने तरफ से कोशिश कर सकता हूं। जैसे अब मैं गाड़ी का उपयोग नहीं करूंगा। हर हफ्ते पौधा लगाऊंगा, उसकी देखरेख करूंगा आदि।” rain4 इंद्रदेव मंद-मंद मुस्कुराए और बोले “जाओ अपने घर जाओ, बारिश शुरू हो गई है।” मैं सपने से जागा, देखा तो कल-कल की ध्वनि सुनाई दे रही थी। खिड़की खोलकर देखा तो सचमुच बारिश हो रही थी। मैं प्रफुल्लित हो उठा लेकिन सोचने लगा अगर इंद्रदेव से मेरी मुलाकात सपना नहीं सच थी तो मुझे अपने वादे को निभाना तो पड़ेगा।


अगले दिन मैं पौधारोपण की तैयारी करने लगा। तभी राधा आई और बोली बाइल निकालो, फिल्म देखने चलते हैं। मैंने कहा बाइक नहीं, रिक्शा से चलते हैं। rain6वो मुंह बिचकाते हुए बोली “रहने दो”। कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, “चलो तो फिर पास वाले गार्डन में चलते हैं।” मैंने कहा नहीं आज पौधारोपण करूंगा, तुम मेरे साथ चलोगी। वह बोली “नहीं, मैं घर जा रही हूं।” इसी तरह पूरा हफ्ता निकल गया। मैं अध्यक्ष से फिर निखट्टू की श्रेणी में आ चुका था। कल तक मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले फिर से मुझ पर गालियों की परसात करने लगे थे। इंद्रदेव से किए वादे के अनुसार मैं पैदल भ्रमण ही करता था। इसी पैदल भ्रमण के दौरान मैंने राधा को उसके नए बायफ्रैंड के साथ बाइक पर देखा। दिल टूट गया, मैं हंसा और आसमान की तरफ देखते हुए बोला, “क्या इंद्रदेव ! आप तो खुश हो गए लेकिन आपके चक्कर में राधा हाथ से निकल गई। अब मुझ पर इतनी कृपा की है तो एक कृपा और कर दो बारिश के साथ-साथ एक अप्सरा भी मेरे लिए भेज दो।” तभी बादल गरजने लगे, शायद इंद्रदेव ठहाके लगा रहे थे। जोरदार बारिश होने लगी। एक स्कूटी आई और मुझसे टकरा गयी। मैं स्कूटी के ऊपर और स्कूटी वाली मेरे ऊपर। दो मिनट की सॉरी-वारी के बाद उसने अपना नाम बताया “मेघा”। मेघा को देखते ही मेरे दिल में गिटार बजने लगे। मैने आसमान की तरफ देखा और इंद्रदेव से बोला “थैंक यू इंद्रदेव, मेघा (बारिश) के साथ आपनी मेरी मेघा भेज ही दी।” खैर, उस मुलाकात में मेरा टांका मेघा के साथ भिड़ ही गया और कल मैं उस के साथ फिल्म देखने जा रहा हूं। लेकिन इस इंद्रदेव को प्रसन्न करने वाली घटना से मुझे सबक जरूर मिल गया। अब चाहे कोई भी कहे मैं इंद्रदेव प्रसन्नार्थ समिति का अध्यक्ष नहीं बनने वाला, बहुत भुगत चुका हूं। आप लोग बोलेंगे तब भी अध्यक्ष नहीं बनूंगा वरना ये मेघा भी पवन के साथ उड़ जाएगी।

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Raj के द्वारा
July 10, 2010

बहुत अच्छ लेख है सुमित भाई, अर्ज़ है वो हमें देख कर मुस्कुराते रहे– वो हमें देख कर मुस्कुराते रहे– वो हमें देख कर मुस्कुराते रहे– फ़िर यूँ हुआ कि हमारी भी हँसी निकल गई…… हा…हा…हा…हा… ऐसे ही लिखते रहो दोस्त्॥

    sumityadav के द्वारा
    July 12, 2010

    प्रतिक्रिया एवं इतनी हंसीभरी टिप्पणी के लिए धन्यवाद राजजी। आगे भी अच्छा लिखने का प्रयास रहेगा। हमारे साथ तो उल्टा हुआ हमारी तो जुबान ही बंद हो गई और नजरें उनकी नजरों में कैद हो गई।

R K KHURANA के द्वारा
July 2, 2010

प्रिय सुमित जी, अच्छा व्यंग है ! इसे तरह लिखते रहिये ! कलम के खिलाडी बन जायेंगे ! मेरा आशीर्वाद ! राम कृष्ण खुराना

    sumityadav के द्वारा
    July 2, 2010

    धन्य हो गया मैं खुरानाजी जो आपका आशीर्वाद मुझे मिला। आपकी प्रतिक्रिया का मुझे हमेशा  इंतजार रहता है। जागरण जंक्शन से ही मैंने लिखना शुरू किया है और आप लोगों से बहुत कुछ सीख रहा हूं। आप लोगों के मार्गदर्शन से मैं सही दिशा में बढ़ा रहा हूं। आगे भी निरंतर अच्छा लिखने का  मेरा पूरा प्रयास रहेगा। प्रतिक्रिया एवं उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद खुरानाजी।

allrounder के द्वारा
July 2, 2010

बहुत अच्छे मेरे Jagranjunction के आमिर खान ऐसे ही दो चार लेख और छपवाओ देश मैं भी जमकर मेघा बरसाओ और देश का सूखा मिटाओ ! बहुत – बेहतरीन लेख !

    sumityadav के द्वारा
    July 2, 2010

    व्यंग्य को पसंद करने एवं टिप्पणी देकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए शुकिया सचिनजी। आइला! आपने तो मुझे आमिर खान बना दिया सरजी। अगर इंद्रदेव मेरे व्यंग्य से खुश होकर या खीझकर बारिश करने लगे तो मैं तो धड़ाधड़ रोज दो-चार लेख छाप दिया करूंगा। जब तक इंद्रदेव परेशान न हो जाएं, छोड़ूंगा नहीं। वैसे आज अपने रायपुर में अच्छी बारिश हुई। 

subodh kant misra के द्वारा
July 2, 2010

बहुत अच्छे से तुमने अपने व्यंग के साथ साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है सुमित, लगे रहो, शुभकामनाए !

    sumityadav के द्वारा
    July 2, 2010

    व्यंग्य को पसंद करने एवं उस पर प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार सुबोधकांतजी।  क्या करें इस गर्मी और मानसून की बेरुखी ने इतना त्रस्त कर दिया था कि सोचा इस पर व्यंग्य ही लिखा जाए।  शायद व्यंग्य पढ़कर इंद्रदेव बारिश करवा दें। :)

kmmishra के द्वारा
July 2, 2010

शाबाश सुमित । बहुत बच्छा व्यंग लिखा है । हास्य के साथ साथ सीख भी दी । एनिमेशन भी मेरी तरह इस्तेमाल करने लगे हो । तुम्हारा लेख पढ़ कर तो लगता है कि गुरू गुड़ ही रहे चेला चीनी हो गया । हा हा हा । बहुत बढ़िया । जारीरखो ।

    sumityadav के द्वारा
    July 2, 2010

    व्यंग्य को पसंद करने के लिए एवं प्रशंसा करके उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार मिश्राजी। हां इस व्यंग्य में एनीमेशन का कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल कर दिया ताकि पाठक बारिश की फुहारें पाठकों पर भी  पड़ें। आप पर भी फुहार जरूर पड़ी होगी। जहां तक बात चेले के चीनी बनने की है तो मिश्राजी क्यूं मैंने तो अभी  सीखना शुरू किया है, सीखने का बहुत लंबा दौर बाकी है। आपके मार्गदर्शन से में निश्चित रूप से बेहतर व्यंग्य और रचनाएं लिख पा रहा हूं और लिखना जारी रखूंगा। धन्यवाद।

Nikhil के द्वारा
July 1, 2010

भाई सुमित जी, आप मेघा को तलाशो या राधा को या अनुराधा को, लेकिन जल्दी तलाशो भाई, आपकी तलाश के बाद हमें भी तो तलाशना है. अच्छा व्यंग्य, सुमित जी. आप एक अछे व्यक्याकर बनाते जा रहे हैं. लिखते रहिये.

    sumityadav के द्वारा
    July 1, 2010

    व्यंग्य को पसंद करने एवं उस पर प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद निखिलजी। आप लोगों के  निरंतर मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन भरी टिप्पणियों से बेहतर होता जा रहा हूं। आगे भी बेहतर लिखता  रहूंगा। प्रोत्साहन के लिए एक बार फिर धन्यवाद। वैसे निखिलजी दोनों भाई साथ में मेघा, राधा, अनुराधा की तलाश करते हैं ढूंढने में आसानी होगी।  जिस लड़की को देखेंगे यही कहेंगे, “ये तेरी भाभी है।”

Manoj के द्वारा
July 1, 2010

अरे यार सुमित कोई बात नही मै तो कहता हू दुबारा बन जाओ एक और मिल अजाएंगी बरखा या वर्षा इन्द्र जी भेज्क देंगे ..काहे कि चिंता करत हो बबुआ

    sumityadav के द्वारा
    July 1, 2010

    मनोजजी, व्यंग्य को पसंद करने एवं प्रतिक्रिया देने के लिए धन्याद। वैसे ये बात तो आपने गजब की की है। अगर अइसा हो जाए तो हम तो बार-बार अध्यक्ष बन जाएंगे। इंद्रदेव खुश रहे तो बरखा और वर्षा दोनों को भेज देंगे। वइसे उपाध्यक्ष का पद खाली है, आप बनना  चाहेंगे का।

    Manoj के द्वारा
    July 2, 2010

    अरे सुमित जी ऐसी बात है तिओ थोडा जुगाड लगावईए हमारा भी कुछ खर्चा पानी करना पडा तो कर भी देंगे.

    sumityadav के द्वारा
    July 2, 2010

    अरे मनोजजी जुगाड़ा काहे का, पूरी समिती आप ही की तो है। सीधे अध्यक्ष ही बनिए वैसे भी इस बार मोहल्ला स्तर नहीं जिले स्तर पर इंद्रदेव को पटाया जाएगा। और इस बार अध्यक्ष को चार नहीं 8 घंटे धूप में खड़े रहना है और राधा भी नहीं खड़ी रहेगी खिड़की पर ध्यान लगान के लिए और वर्षा और बरखा तो मेरे साथ  आईसक्रीम खाने जाएंगी। मैं उपाध्यक्ष के पद से काम चला लूंगा।

ashutosh के द्वारा
July 1, 2010

सुमित जी बहुत ही अच्छा व्यंग किया है आपने / आभार !~ भैया ये देखना मेघा भी राधा की तरह न उड़ जाये / उससे पहले कोई वर्षा खोज लो/

    sumityadav के द्वारा
    July 1, 2010

    आशुतोष जी, व्यंग्य को पसंद करने एवं उस पर टिप्पणी करने के लिए आभार। आपने य़े बढ़िया सलाह दी मेघा अगर राधा की तरह उड़ गई तो। इसलिए हम आज से ही वर्षा की तलाश शुरू कर देते हैं।


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