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मेरे पास आओ मेरे दोस्तों, एक किस्सा सुनाऊं...

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बस एक पॉल (हास्य व्यंग्य)

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DV795112बस एक पल, बस एक पॉल। जिस पल मैंने पॉल ऑक्टोपस बाबा के बारे में सुना बस उस पल से मैं उस पर मोहित हो गया हूं। वो एक पल ही काफी था मुझे घायल करने के लिए। जो अदा पॉल आक्टोपस में है वो करीना और कैटरीना में भी नहीं। वो नजाकत से लहराते हुए तैरना फिर अदा से किसी झंडे पर बैठ जाना, वाह। वैसे मुझे तो पहले से पता कि ऑक्टोपस कोई साधारण जानवर नहीं है। उसमें जरूर कुछ खास बात होगी, पर दुनिया मानने को तैयार ही नहीं थी। लेकिन मेरा हमेशा से मानना था जो अष्टभुजा हो वो साधारण कैसे हो सकता है और आखिर उसने कमाल दिखा ही दिया। पॉल ऑक्टोपस से इतनी जल्दी ऑक्टोपस बाबा बन गया। इतनी तेजी से प्रसिद्ध हुआ यह पहला बाबा होगा। देश के बाबाओं को न जाने क्या-क्या जतन नहीं करने पड़ते भक्त जुगाड़ने के लिए लेकिन ये अष्टभुजाधारी तो बिना कुछ किए ही इतने भक्तों को पा गया। विश्वकप फुटबॉल में तो यह जुमला ही चर्चित हो गया कि जिस पर पॉल बाबा का आशीर्वाद होगा वही विजयी होगा। कुछ हफ्तों के भीतर ही करोड़ों डालर के सट्टे लगने लगे हैं। वो सेलीब्रिटी बन चुका है। जर्मनी की हार के बाद प्रशंसक तो उसको मार मारकर चटनी बना देना चाहते हैं, लेकिन सेलीब्रिटीज के लिए ये सब आम बाते हैं। पॉल आक्टोपस अब ऑक्टोपस नहीं बाबा बन चुका है। और बाबा के चेले इन उद्दंड प्रशंसकों से निपट लेंगे।


वैसे ऑक्टोपस बाबा अगर भारत में होते तो रातों रात सुपरबाबा का तमगा हासिल कर गए होते। अब तक तो इनके नाम से कई आश्रम खुल गए होते, लाखों भक्त रात-दिन उनके दरबार में मत्था टेक रहे होते। इनकी भविष्यवाणियों के आधार पर फिल्मों के नाम रखे जाते, शादियां की जाती, बच्चों के नाम रखे जाते, राजनीतिक पार्टियां किस पार्टी से गठबंधन करे यह भी ऑक्टोपस बाबा से ही तय करवाती। सभी पार्टियों के नाम से मर्तबान ऑक्टोपस बाबा के शाही जलघर में रख दिए जाते और ऑक्टोपस बाबा जिस पार्टी के मर्तबान पर हाथ रख देते उस पार्टी की किस्मत चमक जाती। पर लगता नहीं ऑक्टोपस बाबा का भारत आगमन हो पाएगा वहां की जनता उन्हें आने ही नहीं देगी। इसलिए मैंने यहीं भारत में एक ऐसे ही चमत्कारी बाबा की तलाश करने का संकल्प ले लिया।


अगले दिन मैं आदत की तरह पिताजी की लात और मां की दांत खाने के बाद ही उठा। इधर-उधर स्वाति, सपना, पूजा को देखने बाद ही आंखों में कुछ ताजगी आई। अब मैं निकल पड़ा उस जीव को ढूंढने जो ऑक्टोपस बाबा की तरह अलौकिक हो, खास हो, भविष्यवाणियां करता हो। घोड़े को देखा, हाथी को देखा, तोते को देखा, गधे, चूहे, बिल्ली सबको देखा। पूरा चिड़ियाघर खंगाल मारा लेकिन ऐसा कोई जीव नहीं दिखा जो ऑक्टोपस बाबा की तरह खास हो। गाय के तबेलों को भी छान मारा लेकिन गाय-भैसों में भी वो बात नजर नहीं आई। हां, उनकी शांति में खलल डालने के कारण मुझे उनकी लात जरूर खानी पड़ी और गोबर के कंडे थापने पड़े वो अलग। थक-हार कर मैं घर वापस आया। अभी चौकdog running पर झुके कंधों के साथ निराशा में डूबा मैं बैठा ही था कि पिल्लू पर नजर पड़ी। पिल्लू हमारे मोहल्ले का चौकीदार है। नहीं…नहीं… वो सीटी बजाने वाला नहीं, भौंकने वाला चौकीदार। पिल्लू मोहल्ले का आवारा कुत्ता है लेकिन पालतू से कम नहीं। मोहल्ले की शान है पिल्लू, सबकी जान है पिल्लू। मुझे उस मरियल से पिल्लू में उस अद्भुत जीव के दर्शन होने लगे जो ऑक्टोपस बाबा को टक्कर दे सकता था। जब भी मैं क्रिकेट मैच खेलने जाता था पिल्लू हमारी टीम के बल्ले पर मूत्र विसर्जन कर देता था और उस दिन इत्तेफाक से हमारी टीम जीत जाती थी। अब मुझे ये इत्तेफाक नहीं पिल्लू की चमत्कारी शक्ति लगने लगी dog peeingथी, जिसे मैं पहचान ही नहीं पाया। पिल्लू में एक और खास बात थी, इस बेवफाई के दौर में इंसानों के साथ रहते हुए भी वह अब तक वफादार था। कुछ खास तो था उसमें। इसलिए जिस पिल्लू को मैं लात मार-मारकर भगाया करता था आज उसे प्यार से पुचकारने लगा और उसे मन ही मन उसे पिल्लू बाबा बनाने की सोचने लगा। क्रिकेट वर्ल्ड कप भी ७-८ महीनों बाद है इसलिए मैंने सोचा कि अबकी बार मैं पिल्लू से भविष्यवाणी करवाऊंगा कि कौन सी टीम मैच जीतेगी। दो देशों के झंडे गाड़ूंगा और जिस झंडे पर पिल्लू ने मूत्र विसर्जन कर दिया और पिल्लू की चमत्कारी शक्तियों ने काम कर दिया तो समझ लो वो टीम जीत जाएगी। अगर ऐसे ही शुरूआती ४-५ मैचों में पिल्लू की शक्तियों ने जादू दिखा दिया तो मेरे पिल्लू को पिल्लेश्वर बाबा बनते और मुझे भी प्रसिद्ध होते देर नहीं लगेगी। और अगर किसी मैच में हार भी गए तो इसके लिए बहानों की फेहरिस्त पहले से तैयार थी। मुझ जैसे निठल्ले के लिए इससे बड़ा पैसा कमाने का फार्मूला नहीं था। लेकिन पिल्लू को देशों के झंडे पर मूत्र विसर्जित करवाने में खतरा था क्योंकि अगले दिन उन देशों के लोग और मीडिया द्वारा मेरे घर पर पत्थर बरसाने का डर था। इसलिए मैंने इसके लिए विकल्प खोजना शुरू कर दिया। साथ ही पिल्लू का नाम पिल्लेश्वर से कुछ अलग रखने की सोची। पिल्लेश्वर चालू नाम लगता है, उसमें वो आकर्षण नहीं था। कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया कि पिल्लू का नया नाम होगा- “पॉल”। “पॉल” नाम में अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव भी था, इससे विदेशी मीडिया भी मेरे “पॉल बाबा” के चमत्कार को कव्हर करती। अब बारी थी “पॉल” के मूत्र विसर्जन शक्ति के विकल्प को तलाशने की।


अगली सुबह मैं जल्दी उठा, क्यां करूं पैसा और प्रसिद्धि बनाने की मशीन को तैयार जो करना था। भारत को उसके बहुप्रतीक्षित “पॉल बाबा” से रूबरू जो करवाना था। वैसे तुक्के मारने में मैं भी कम नहीं था, कई शर्ते मैंने तुक्का मारकर ही जीती हैं, सो मैंने सोचा अपने इस तुक्का मारू शक्ति और पॉल की शक्ति को मिलाकर कुछ किया जाए। मैंने तय कर लिया कि तुक्का मैं मारूंगा और पॉल को ट्रेन करूंगा कि वो उस देश को झंडे को चाटे जिसे मैंने चुना है। चार-पांच तुक्के सही निकल गए तो हमको प्रसिद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता और मीडिया तो ऐसी खबरों को कवर करने के लिए बेकरार रहता ही है। dog lickingअब मुझे पॉल को झंडे पर मूत्र विसर्जन के बजाए झंडे को चाटने की ट्रेनिंग देने थी क्योंकि अब अखबारों में पॉल की मूत्र विसर्जन करते हुए फोटो तो नहीं छप सकती ना। झंडा चाटते हुए पॉल ज्यादा स्टाइलिश लगेगा। इसलिए मैंने अपनी पसंद के देश के झंडे पर पॉल के पसंद के बिस्किट लगा दिए और दूसरी झंडे पर चालू बिस्किट। चूंकि पॉल लालची भी था इसलिए वह मेरी पसंद वाले झंडे को ही चाटता था। कुछ ही महीनों में पॉल पूरी तरह प्रशिक्षित हो चुका था।


dog sadhuअब बारी थी पॉल को पॉल बाबा बनाने की।  इसके लिए मैंने उसे भगवा वस्त्र पहनाए और गले में ५-१० बाजारू मालाएं टांग दी। जिस दिन वर्ल्ड कप का पहला मैच हुआ मैं मोहल्ले के चौक पर खड़ा हुआ और भारत और श्रीलंका के झंडे गाड़ते हुए बोला- “देखो, मेरा पॉल चमत्कारी है, जिस झंडे को पॉल चाटेगा वही टीम जीतेगी।” मैंने पॉल की धीरे से लात मारा और वो जाकर भारत के झंडे को चाटने लगा। लोगों ने इसे मुझ निठल्ले की कोई बेवकूफी समझी और घर चले गए। इत्तेफाक से उस दिन भारत जीत गया। इस घटना के बाद कुछ लोगों ने पॉल की शक्ति पर विश्वास करना शुरू कर दिया। अपनी गाड़ी ने स्टार्ट ले लिया था। दो दिन बाद भारत और बांग्लादेश का मैच था। मैंने फिर चौक पर भारत और बांग्लादेश के झंडे गाड़े। इस बार पॉल की यह करामात देखने पहले ज्यादा दर्शक थे। मैंने धीरे से पॉल को बांग्लादेश का झंडा चाटने का इशारा किया, उसने वैसा ही किया। लोगों ने इसे मजाक में लिया लेकिन कुछ लोगों को पॉल पर भरोसा था और उन्होंने बांग्लादेश पर पैसे लगा दिए। लेकिन मुझे पता था कि भारत ही ऐसी टीम है जो किसी दिन श्रीलंका जैसी टीम को हरा सकती है तो अगले दिन बांग्लादेश जैसी कमजोर टीम से हार भी सकती है। मेरा तुक्का फिर सही पड़ गया और लोगों में पॉल के प्रति विश्वास और भी बढ़ गया। मेरा फार्मूला चल निकला था। लोग अब पॉल के मुरीद हो चुके थे। मैंने कुछ मीडिया के लोगों को भी जुगाड़कर इसे कव्हर करवाया और फिर पॉल अखबारों की सुर्खियां बन गया। न्यूज चैनल भी कहां पीछे हटने वाले थे, उन्हें तो मसाला चाहिए और मसाला बांटने के लिए मैं और पॉल तो थे ही।


इस तरह मेरी उम्मीद के मुताबिक मैं और पॉल कुछ ही दिनों में चर्चित हो गए। पॉल ने बाबा की उपाधि ग्रहण कर ली और मैंने बाबा के गुरू की। क्वार्टरफायनल और सेमीफायनल में भी मेरा तुक्का चल गया और भारत जीत गया, इससे अन्तरार्ष्ट्रीय मीडिया भी हमारी तरफ आकर्षिक हो गई। बेचारे ऑक्टोपस बाबा तो हमारी प्रसिद्धि देख पानी में भी जलने लगे। लेकिन बवाल तो तब हुआ जब वर्ल्डकप का फायनल मैच हुआ। फायनल में आस्ट्रेलिया और भारत का मुकाबला था। अहम मौकों पर भारत के हारने के गुण को देखते हुए मैंने आस्ट्रेलिया पर दांव लगाया और पॉल ने भी आस्ट्रेलिया के झंडे को चाटा। और उम्मीद के मुताबिक भारत हार गया। इसके बाद तो भारत की हार भड़के कुछ प्रशंसक पॉल को दोषी मानकर उसकी जान के पीछे पड़ गए लेकिन मैं निश्चिंत था क्योंकि मुझे पता था अब तक पॉल बाबा के प्रशंसकों की संख्या उन भड़के हुए समर्थकों से कई गुना हो चुकी थी। इतने सारे प्रशंसक अपने पॉल बाबा का नुकसान कैसे होने देते, अंधश्रद्धा तो भारतीयों का नैसर्गिक गुण है, तभी तो कुकुरमुत्ते की तरह हर गली में पैदा होते बाबाओं की रोजी रोटी इतने मजे से चलती है। चूंकि पॉल बाबा अब सेलीब्रिटी बन चुका था लिहाजा उसे जेड श्रेणी की सुरक्षा भी उपलब्ध करा दी गई थी। क्या नेता, क्या व्यापारी सब के सब उसके भगत बन गए। जिस शहर में पॉल बाबा पहुंच जाते वहां जनसैलाब उमड़ पड़ता। शादी के लिए वर-वधु चुनने के लिए भी लोग पॉल बाबा की राय लेने लगे। एक युवक १० लड़कियों की फोटो लेकर आया और पॉल बाबा के सामने रख दिया। पॉल बाबा रोज-रोज की भीड़ से खिसिया चुके थे और वे उन सभी फोटो को नोच-नोचकर खा गए। उस युवक ने इस घटना को दूसरे अर्थ में ले लिया और सोचा कि शायद पॉल बाबा का आदेश है कि जीवनभर शादी मत करो। उसने पॉल बाबा के चरण छुए और जीवनभर कुंवारे रहने का शपथ लेकर चल दिया। उस बेवकूफ को क्या पता कि पॉल तो खीझ के कारण फोटो को नोंच रहा था। खैर, उस दिन के बाद उस युवक से कभी मुलाकात नहीं। हमको इससे क्या, पॉल और मैं तो जिंदगी के मजे ले रहे थे।


इतने महीनों की व्यस्तता और भीड़भाड़ से हम पक चुके थे। हमें अब बदलाव चाहिए था। पैसे भी बहुत थे, सो हम दोनों निकल लिए वर्ल्ड टूर पर सोचा अब डॉलर में कमाया जाए और जर्मनी के एक्वेरियम में बैठे उस ऑक्टोपस बाबा को भी चिढ़ाया जाए, आखिर आइडिया तो उसी को देखकर आया था। दुनिया के लिए वो पॉल बाबा था लेकिन मेरे लिए तो मेरा वफादार पॉल था। पॉल ने अब गाड़ी चलाना भी सीख लिया था, पता नहीं कैसे। हम दोनों स्विट्जरलैंड की हसीन वादियों में लांग ड्राइव का मजा ले रहे थे। हम घूम रहे थे…. घूम रह थे…. और घूम रहे थे…. कि तभी किसी ने मेरे सिर पर जोरदार चपेट मारी और मुझे बालों से पकड़कर उठाया। जोरदार चिल्लाने की आवाज आई- “अरे कुंभकरण! चल उठ सुबह के दस बज गए। कितने सपने देखेगा।” रोज की तरह पिताजी चिल्ला रहे थे। इतना सुनते ही मैं हड़बड़ाकर उठा। अपनी आंखों को मसलता हुआ मैं बाहर आया। बाहर आकर देखा तो पिल्लू रोज की तरह कूड़े में खाना तलाश रहा था। इसका मतलब मैं अभी तक सपने में था। कोई बात नहीं इस सपने को सच में तब्दील करना ही पड़ेगा। मेरे और शोहरत के बीच सिर्फ एक “पॉल” का फासला है। आप लोग क्या कहते हैं, बना दूं पिल्लू को पॉल…?

DOG-car

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

soni garg के द्वारा
July 14, 2010

बना दीजिये इस पिल्लू को पॉल मगर बेचारे को इतना मत दोडाइए थक जायेगा और अगर मेनका गाँधी आ गई तो …………..????

    sumityadav के द्वारा
    July 14, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद सोनीजी। आपने गौर नहीं किया लेकिन आखिर में हमारा पिल्लू कार चलाना सीख ही जाएगा तो दौड़ने का सवाल ही कहां है। और मेनका गांधी भी पिल्लू की इस प्रगति से कतई नाराज नहीं होंगी। हो सकता है वो मुझे एक डॉग ड्राइविंग स्कूल खोलने की ही सलाह दे दें।

chaatak के द्वारा
July 13, 2010

सुमित जी, पिल्लू को पॉल बना ही दिया जाय मज़ा आ जायेगा | साड़ी सेलिब्रिटी जल के ख़ाक हो जाएँगी और दुनिया को जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुँच चुके आक्टोपस बाबा का उत्तराधिकारी भी| अंधविश्वास पर अच्छा व्यंग, बधाई !

    sumityadav के द्वारा
    July 14, 2010

    व्यंग्य को पसंद करने एवं उस पर प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद चातकजी। हां ऑक्टोपस बाबा ने तो अब संन्यास ले लिया या कहें उनको संन्यास दिला दिया गया। अब उनके उत्तराधिकारी के लिए पिल्लू ही ठीक रहेगा। कल से उसकी ट्रेनिंग स्टार्ट कर दूं। मैं तो कहता हूं अगला ब्लागस्टार कौन बनेगा ये भी पिल्लू ही बताएगा। अंधविश्वास ने समाज को बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। इसी पर कटाक्ष करने का प्रयास था। 

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 10, 2010

सुमित जी एक अच्छे व्यंग लेख के लिए बधाई ………….. सुमित जी जैसा की मैंने अनुभव किया है की आज के परिवेश में दुनिया का हर व्यक्ति बिना कुछ किये ही सब कुछ पाने की इच्छा रखता है, और मानव की इसी प्रकृति ने उसे सफलता और लोकप्रियता के सरल उपाय प्राप्ति के लिए प्रेरित किया है ………………… और अपनी इन्ही विकृत प्रवित्तियों के कारण आज मानव अन्धविश्वाशी होता जा रहा है, उदाहरण और इस बात की पुष्टि के लिए प्रतिदिन हमें ऐसे समाचार मिलते रहते हैं ……………. और जैसा की आपने भी अनुभव किया होगा की आज ये मात्र भारत या एशियाई देशों की समस्या नहीं है, अपितु ये वैश्विक समस्या का रूप लेती जा रही है …………….. इसक एक और सबसे बड़ा कारण ये है की मानव अपनी कार्यक्षमताओं में विश्वाश खोता जा रहा है, और उसे पल प्रतिपल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा रहती है ………………………. लोग ये भूल गए हैं की कर्म प्रधान है, भाग्य की नौका में सवार होकर चमत्कारों की प्रतीक्षा करने और ईश्वर को नाविक बना देने से सागर नहीं पार किया जा सकता है ! इसके लिए जरूरी है की हम स्वयम में नाविक के गुण का विकास करें… और विपत्ति में धैर्य और कर्म योग का सहारा लेकर जीवन के सागर की यात्रा पर निकलें…………………. लोगों को सही रास्ते पर लाने के माध्यमों में आलोचना, शिक्षा और आत्मसात करके प्रस्तुत किये गए उध्वहरणों का योगदान प्रमुख होता है …………………. आपलोग इसी तरह से आलोचनाओं से इस दिशा में सार्थक प्रयाश करते रहें ……..

    sumityadav के द्वारा
    July 12, 2010

    मैं तो इन ढोंगी बाबाओं का प्रखर आलोचक हूं। लेकिन इन बाबाओं को ऊपर लाने वाली भी जनता ही है। हम लोग अपनी परेशानियों का हल अपने कर्मों के बजाए किसी के प्रवचनों एवं आशीर्वाद में  ढूंढने की सोचते हैं। हम शायद भूल जाते हैं कि जो खुद की मदद करता है भगवान भी उसी की मदद  करते हैं। हमारा कमजोर विश्वास ही इन बाबाओं को बढ़ावा दे रहा है

Raj के द्वारा
July 10, 2010

सुमित जी, हमारे देश के बाबाओं को हार्ट अटैक आ जाएगा अगर बाबा पाल भारत में पधारे

    sumityadav के द्वारा
    July 12, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद राज जी। मैं तो चाहता हूं कि पॉल बाबा आएं और कम से कम इन बाबाओं और इनके फर्जी प्रवनचों से मुक्ति तो मिलेगी। पॉल बाबा तो बेजुबान हैं और वो कम से कम हमें पकाएंगे तो नहीं।

sumityadav के द्वारा
July 10, 2010

व्यंग्य को पसंद करने एवं प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद निखिलजी। हां, भारत में बाबाओं के लिए बहुत स्कोप है क्योंकि सब अपनी समस्याओं का समाधान इन फर्जी बाबाओं में तलाशते न कि खुद के आत्मविश्वास में। आपकी प्रार्थना सर आंखों पर। वैसे में भी ज्यादा लंबे व्यंग्य पसंद नहीं करता लेकिन ये लेख कुछ लंबा हो गया। 

Nikhil के द्वारा
July 10, 2010

वैसे मैं थोडा हैरान हूँ की आपको आपके इस लेख पर अभी ताk प्रतिक्रिया क्यूँ नहीं मिली. खैर, आपका ये लेख मुझे पसंद आया. आपने सही कहा, पोल अगर भारत मैं होता तो सुपर बाबा बनता, लेकिन तब जब क्रिकेट की भविष्यवाणी करता. और हाँ आपके इस पोल का कर चलते हुए जो तस्वीर आपने लगायी है, वो आपके लेख का सबे बेहतरीन भाग है. एक निजी प्रार्थना है, आप थोडा लेख की लम्बाई कम करें मेरे लिए, एक साथ इतने शब्द पढता हूँ तो आधा भूल जाता हूँ.


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