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हनुमान भक्त सांप (व्यंग्य)

Posted On: 8 Sep, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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snakeसांप एक बहुत ही भोला-भाला, मासूम सा जीव है। अजी, सच कह रहा हूं। अब जो भोलेनाथ के सर की शोभा बढ़ाता है वो भी तो भोला होगा ना। नीतिवचन में कहा गया है कि सीधे वृक्ष काट दिए जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्ष ज्यों के त्यों रहते हैं। ठीक उसी तरह सीधे-सादे सांप का मनुष्य ने बहुत शोषण किया। कभी बिना उसकी इजाजत के उसे मुहावरों में जबरन ठूंस-ठूंसकर उसे खलनायक का दर्जा दे दिया तो कभी फिल्मों में उसे फिट करके पैसे बना लिए और सांपों को रायल्टी तक नहीं दिया। यहां तक तो बेचारे सांप ने किसी तरह बर्दाश्त कर भी लिया मगर हद तो तब हो गई जब इंसानों ने उसके निजी जीवन तक को नहीं छोड़ा। जंगलों में कैमरे लगा दिए। नाग-नागिन रोमांस करने जाएं तो उसकी शूटिंग, बिल से बाहर निकले तो शूटिंग, बिल में छुपे रहे तो भी शूटिंग। इतनी शूटिंग हो गई कि दहशत में कई नागिनों ने तो अंडे देना ही बंद कर दिए। प्रणय के लिए जा रहे एक सांप को एक जीव वैज्ञानिक ने रास्ते में ही उठा लिया और उंगली दिखा-दिखाकर उसकी विशेषताएं बताने लगा। बेबस सा सांप फुफकारते हुए बोला- ” मेरी जितनी विशेषताएं बताना है बता ले, लेकिन अगर आज मैं अपनी प्रेमिका से नहीं मिल पाया तो सोच लेना तुझे तेरी सुहागरात नहीं मनाने दूंगा।”  इंसानों की आबादी तो बढ़ती रही लेकिन सांपों की आबादी पर अल्पविराम लग गया।


फिर भी सांप सब कुछ रेंगते-रेंगते सहते रहे। सांप के आहार में चूहे, गिलहरी जैसे छोटे जानवर आते हैं लेकिन इंसानी करतूत के कारण इनका आहार भी छिन गया। गिलहरी और मेंढक तो ढूंढे नहीं मिलते हैं फिर भी जिस दिन मिल गए समझो उस दिन सांपों की दिवाली होती थी। इसलिए सांपों ने मजबूरन चूहे को ही अपने मेनू में टॉप पर रखा था पर यहां भी उनका निवाला छिन गया। यूरिया और खाद मिले अनाज खाने वाले चूहे को खाने से कई सांपों के पेट में मरोड़ होने लगा और कई तो मौके पर ही लुढ़क गए। सांपों की ऐसी दुर्गति देखकर सांपों ने प्रकृति के विपरीत जाकर शाकाहारी होने का फैसला किया। ऐसा ही एक शाकाहारी नाग सुबह अपनी प्रेमिका नागिन के लिए भोजन की तलाश में निकला। नागपंचमी के दिन तो दोनों ने दूध में “मिल्क बाथ” लिया लेकिन उसके बाद से उनको कोई पूछने नहीं आया और तब से उपवास ही चल रहा है। सांप सोचने लगा ये नागपंचमी रोज क्यों नहीं आती। सोचते-सोचते वह हनुमान मंदिर के पास पहुंचा। हनुमान जी की मूर्ति के पास भोग में चढ़ने वाला सामान रखा हुआ था। मिठाई, फल, आदि। सांप ने सोचा यहीं फन मारा जाए, मंदिर भी पास ही में है पांच मिनट में काम निपट जाएगा। बेचारा सब बटोर ही रहा था कि उसे किसी ने देख लिया। उसे देखने वाला सनसनी की खोज में निकला टीआरपी की मार से पीड़ित न्यूज चैनल का सनसनाता रिपोर्टर था। सांप को हनुमानजी को चढ़ा भोग खाता देख उसने उसे हनुमानभक्त सांप की पदवी दे दी और फौरन अपने जैसे अन्य सनसनीपिपासु पत्रकारों को वहां मिनटों में खड़ा कर दिया। लोग इकट्ठे होते चले गए, दो आए, चार आए, आठ आए, पलक झपकते ही पूरा मंदिर हाऊसफुल हो गया। कुछ देर बाद तो हनुमानभक्त सांप को देखने टिकट लगने लगा था। कुछ चलताऊ किस्म के टपोरियों ने तो वहां साइड में साइकिल और गाड़ी स्टैंड भी लगा दिया। सायकिल का १० मोटसायकिल का २० और कार का ५० रुपए मात्र। हां प्रेसवालों और वीआईपी लोगों के लिए मुफ्त।


snake2हनुमानभक्त सांप ने अब तक कईयों का बेड़ा पार लगा दिया था। सुबह से दोपहर हो गई वह सांप उसी अवस्था में अपनी कुंडली में मिठाई, फल और भोग का प्रसाद लपेटे हुआ था। वो तो आया था ५ मिनट के लिए लेकिन इन खुरापानी इंसानों ने ५ घंटे रुकवा दिया। इतने में ही किसी पंडित ने घोषणा की कि यह सांप परम हनुमान भक्त है। पिछले जनम में ये परम हनुमान भक्त था और इस जन्म में सर्प रूप में फिर हनुमानजी के चरणों में अपनी भक्ति दिखाने आया है। सांप सोचने लगा- “खाली पेट न होय भक्ति, मैं तो खाना जुगाड़ने आया था या ये लोग मुझसे भक्ति करवाने पर तुले हैं। इस पंडित को अपने इस जन्म का ठीक से पता नहीं और मेरे पिछले जनम की कहानी सुना रहा है।” सभी रिपोर्टर पंडित की इस बात को लाइव दिखाने लगे। पंडित भी खुद को कैमरे के सामने पाकर अपने लुक पर ध्यान देने लगा और बीच-बीच में अपने बाल और धोती भी ठीक करता। इधर सांप बाहर निकलने के लिए जरा सी हलचल क्या करता कि सारे कैमरे और माइक उसी की ओर घूम जाते। सांप की तरह दिख रहे माइक उस हनुमान भक्त सांप को और भयभीत कर रहे थे। मगरमच्छ के मुंह की खुले हुए कैमरे उस हनुमानभक्त सांप को खा जाने को आतुर थे।


इसी बीच थका हुआ सांप जरा देर के लिए सो गया। तभी किसी ने हल्ला कर दिया कि हनुमानभक्त सांप को हनुमानजी के चरणों में अद्भुत शांति का अनुभव मिल रहा है, तभी वो उनके पैरों में सो गया। देखों किस तरह खुद को हनुमानजी के चरणों में खुद को अर्पित कर दिया है। इतना सुनते ही सांप फिर जाग गया। वह भगने के प्रयास में दाएं मुड़ता तो कोई एक नई कहानी के साथ पेश हो जाता है। बाएं मुड़ता तो फिर कोई कहानीकार नई कहानी बना देता। ऐसे लग रहा था मानो देश के सारे कहानीकार यहीं उपस्थित हो गए हैं और सांप के साथ अपना बैर निभा रहे हैं। एक चलते-फिरते भजन गायक ने तो तत्काल हनुमानभक्त सांप के ऊपर आरती बना दी और उसका आरती गायन भी शुरू कर दिया। कुल मिलाकर सबकी अपनी अलग-अलग कहानी थी, पर सबका हीरो एक ही था- “हनुमानभक्त सांप”।


अभी ये सब चल ही रहा था कि हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। कुंवारे-कुंवारियां विशेषकर दूध पिलाने आए क्योंकि पंडितजी ने घोषणा कर दी थी कि इस हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने वाले कुवारे-कुवारियों की शादी महीनेभर के भीतर हो जाएगी। सांप सोचने लगा- “अबे बेवकूफों, तुम लोगों के चक्कर में मेरी खुद की शादी नहीं हुई। बमुश्किल एक नागिन मिली है उसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हूं और तुम लोग मुझे दूध पिलाकर अपनी शादी करवाने के जुगाड़ में हो। अरे निर्दयियों अगर मैंने इतना दूध पी लिया तो मेरा रंग तो ऐसे ही काले से गोरा हो जाना है और जात बाहर हो जाऊंगा वो अलग।” फिर भी लोग हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने लड़ते-मरते रहे।


हनुमानभक्त सांप बाहर निकलने का रास्ता तलाशने लगा। इसी जुगत में वह हनुमानजी की मूर्ति के चक्कर लगाने लगा। तो लोग इसका अर्थ निकालने लगे कि सांप भक्तिधुन में नाच रहा है और उसे मोक्ष मिलने वाला है। सांप भी परिक्रमा करते हुए सोचने लगा- “तुम लोगों को जो सोचना है सोचो, एक बार यहां से निकल जाऊं कसम खाता हूं दोबारा नहीं आऊंगा। मेरे लिए तो फिलहाल यहां से निकलना ही मोक्ष समान है।”


शाम से रात हो गई। सांप भी बाहर न जाने के कारण उकता गया था। सबकी नींद उड़ाने वाले रिपोर्टर धीरे-धीरे नींद की गिरफ्त में आ गए। सांप ने मौका देखा और अपनी केंचुली निकालकर वहां से खिसक लिया।  नींद खुलने के बाद रिपोर्टरों ने जब सांप को गायब देखा और सिर्फ उसकी केंचुली देखी तो फिर टीवी पर ब्रैकिंग न्यूज फ्लैश करने लगे- हनुमानभक्त सांप हनुमानजी में समा गया। ऐसी अद्भुत भक्ति  कभी किसी ने देखी न होगी। सांप अपनी केंचुली यहां छोड़कर हनुमानजी की मूर्ति में समा गया। जय हो हनुमानभक्त सांप की। सब रिपोर्टर फिर से हनुमानजी की मूर्ति और केंचुली की फोटो उतारने में मशगूल हो गए। लोगों द्वारा हनुमानभक्त सांप की आरती गायन और कहानी लेखन का कार्यक्रम फिर से शुरू हो गया। सांप दूर से ही यह सब देखता रहा और वापस चले गया।


बम्पर ऑफर- अगर आप लोग हनुमानभक्त सांप की आरती को अपना रिगटोन बनाना चाहते हैं तो snake1अपने मोबाइल से saap लिखकर 55555 पर भेज दीजिए। हनुमानभक्त सांप की केंचुली के फोटो और उससे बने ताबीज के लिए आप संपर्क कर सकते हैं बाबा नागराज से। घरपहुंच सेवा उपलब्ध है। घरपहुंच सेवा का अतिरिक्त चार्ज लगेगा क्योंकि हमारे हॉकर कोई नागराज नहीं हैं जो उड़कर आप लोगों के घर टपक जाएंगे, गाड़ी से आना पड़ेगा और पेट्रोल भी महंगा हो गया है।

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197 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
March 16, 2011

हा हा हा हा ….बहुत सुंदर व्यंग “अरे निर्दयियों अगर मैंने इतना दूध पी लिया तो मेरा रंग तो ऐसे ही काले से गोरा हो जाना है और जात बाहर हो जाऊंगा वो अलग।” , कमाल की पञ्च लाइन है…

omprakash pareek के द्वारा
September 30, 2010

सुमितजी, भई, ” मन की किंवाडिया खोल कर बोल रहा हूँ जो बोलना चाहता हूँ ” अर्ज किया है की आप वाकई बहुत अच्छा व्यंग लिखते हैं. आपके हिलते-डुलते सर्पराजों ने इस आलेख की शोभा बढाई है commonwelth Games Village men saanpon ko dekh कर hamare videshi mehmaan dar gaye the par unhen kya pata की yeh to hamare nagdevta हैं jinhen naag panchmi par ham doodh pilate हैं aur inka sthaan bhi ooncha है kyon की ye shankar bhagwaan ke gale men viraajmaan rahte हैं. oppareek43 .

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
September 26, 2010

प्रिय सुमित जी, इस मंच पर व्‍यंग की लौ जलाए रखनें के लिए आभार । हनुमान भक्त सांप के माध्‍यम से मीडिया की करतूतों का वर्णन बहूत ही दिलचस्‍प रहा । एक अच्‍छी रचना । बस इसी तरह लिखते रहिए । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
September 9, 2010

प्रिय सुमित जी, आपके इस व्यंग को पढ़कर सुबह-सुबह इतनी मात्रा में हंस लिया की पूरे दिन का कोटा फुल है अब हंसने के बराबर रोने वाला सिद्धांत लागू न हो तो और मज़ा आ जाए| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    sumityadav के द्वारा
    September 10, 2010

    चिंता न करें चातकजी। हंसी बराबर रोने वाला सिद्धांत आप पर लागू नहीं होगा। अरे हम जैसे  आपके प्रशंसक जब हैं तो रोने-धोने का तो सवाल ही नहीं। 

आर.एन. शाही के द्वारा
September 9, 2010

सुमित जी बहुत बढ़िया व्यंग्य, और साथ ही वर्तमान भेड़चाल की प्रवृत्ति से परिचय कराने वाली रचना भी … बधाई ।

    sumityadav के द्वारा
    September 10, 2010

    आपकी प्रेरणात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद शाहीजी।

    Taron के द्वारा
    July 26, 2016

    By January 28, 2013 – 11:06 pmrgeetinGs! I know this is somewhat off topic but I was wondering which blog platform are you using for this website? I’m getting fed up of WordPress because I’ve had issues with hackers and I’m looking at alternatives for another platform. I would be fantastic if you could point me in the direction of a good platform.

kmmishra के द्वारा
September 8, 2010

सनसनीपिपासु पत्रकारों – पहली बार सुना यह शब्द । जय हो बाबा सुमित जी की । अबे बेवकूफोंए तुम लोगों के चक्कर में मेरी खुद की शादी नहीं हुई। बमुश्किल एक नागिन मिली है उसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हूं और तुम लोग मुझे दूध पिलाकर अपनी शादी करवाने के जुगाड़ में हो। अरे निर्दयियों अगर मैंने इतना दूध पी लिया तो मेरा रंग तो ऐसे ही काले से गोरा हो जाना है और जात बाहर हो जाऊंगा वो अलग। डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्रफी वाले दोनो उठा कर ले जायेंगे तुमको अपना रिपोर्टर बनाने के लिये । बहुत सुंदर हास्य और व्यंग का मिश्रण किया है । आभार ।

    sumityadav के द्वारा
    September 10, 2010

    नमस्कार मिश्राजी। हमारा ही ईजाद किया हुआ है यह शब्द। क्या करें कोई शब्द नहीं मिल रहा था इसलिए हमने ही बना दिया। न न घर-परिवार और अपनी…………. से दूर जंगलों में जीवन बिताने का मुझे कोई शौक नहीं है। हम तो जीयो और जीने दो में विश्वास रखते हैं। जानवर जंगल में खुश  और हम शहर में।

R K KHURANA के द्वारा
September 8, 2010

प्रिय सुमित की, बहुत ही सुन्दे व्यंग लिखा है आपने ! बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    sumityadav के द्वारा
    September 10, 2010

    खुरानाजी आपकी प्रतिक्रिया पाकर हमेशा ही उत्साह बढ़ता है। व्यंग्य की प्रशंसा करने के लिए  आभार। 

Piyush Pant के द्वारा
September 8, 2010

बहुत खूब……….. लगे रहो………. एक अलग तरीका है आपके लेखन का …………….. सुन्दर ………

    sumityadav के द्वारा
    September 9, 2010

    लेखन को सराहने एवं प्रतिक्रिया देकर उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत शु्क्रिया पीयूष जी।

bhagwanbabu के द्वारा
September 8, 2010

भाई मज़ा आ गया अच्छा लिखते हो लिखते रहो धन्यवाद http://www.bhagwanbabu.jagranjunction.com

    sumityadav के द्वारा
    September 9, 2010

    उत्सावर्धन एवं प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद भगवान बाबू जी। आगे भी अच्छा लिखने का प्रयास निरंतर जारी रहेगा।

Ramesh bajpai के द्वारा
September 8, 2010

सुमित जी बाकि तो ठीक है घर पहुचने वाली सेवा जरा कुछ दिन क्र लिए स्तगित रखिये बारिस में ये बिना मागे जो मिल जाती है , बहुत बहुत बधाई

    sumityadav के द्वारा
    September 9, 2010

    सही कहा बाजपेयीजी आपने। मानसून में गलत आफर निकाल दिया। कोई बात नहीं पर याद  रखिएगा मानसून में आने वाला हर सांप हनुमानभक्त नहीं होता। प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से  बधाई।


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