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मेरे पास आओ मेरे दोस्तों, एक किस्सा सुनाऊं...

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आवश्यकता है मूर्खों की.... (व्यंग्य)

Posted On: 1 Apr, 2012 Others में

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French-April-Fools-Dayआवश्यकता है मूर्खों की, इच्छुक व्यक्ति कृपया आवेदन करें। एक बार मूर्ख बनने पर 500 रुपये दिया जाएगा।  मैं अखबार में इश्तेहार देने के लिए कागज पर यह सब लिख ही रहा था कि गलत टाइमिंग पर टपकने में उस्ताद मेरे मित्र साहूजी आ गए। आते ही मेरे हाथ से वह कागज छीना और चौंकते हुए पूछने लगे-  यह भी कोई इश्तहार हुआ अखबार में देने लायक। इश्तहार देना ही है तो शादी का दो, शादी की उम्र भी हो गई है। मैंने कहा- मित्र, बहुत जरुरी है यह इश्तहार देना, शादी तो होती रहेगी पर पहले जरुरी है मूर्ख दिवस पर किसी को मूर्ख बनाना। साहूजी बोले- वही तो मैं कह रहा हूं, शादी कर लो मूर्ख अपने आप बन जाओगे।


मैंने कहा- आप समझे  नहीं मुझे मूर्ख बनना नहीं मूर्ख बनाना है।  मैं बहुत चिंतित हूं दिन ब दिन मूर्खों की घटती संख्या से। मुझे डर है कि अगर इसी तरह मूर्खों की संख्या घटती रही तो मूर्ख दिवस विलुप्त  हो जाएगा।  जिस गति से लोग मूर्ख से समझदार बनते जा रहे हैं वह खतरे की घंटी है। बांघों के लिए जैसे संरक्षण कार्यक्रम चल रहे हैं वैसे ही हमें मूर्ख संरक्षण कार्यक्रम चलाना चाहिए। खैर, यह तो हुई भविष्य की बात फिलहाल मुझे मूर्खों की तात्कालिक आवश्यकता है। काश…. डोमिनोज में मूर्ख भी मिलते, 30 मिनट में उन्होंने एकाध की होम डिलिवरी मेरे घर करा दी होती।  साहूजी  तपाक से बोले- इतना चिंतित न हो, जब तक तुम इस धरती पर हो, मूर्खों की पताका लहराती रहेगी। मैंने कहा- माना मैं मूर्ख हूं पर खुद को मूर्ख बनाने में क्या मजा। पिछले कई सालों से मैं मूर्ख दिवस पर किसी को मूर्ख नहीं बना पाया हूं। इसका मुझे बड़ा दुख है। कुछ इसी तरह का दुख मुझे तब हुआ था जब मैं सायकिल को छो़ड़कर मोटरसायकिल पर आया था। मैंने सोचा मेरी तरक्की हो गई पर पेट्रोल ने हमपे ऐसा जुल्म ढाया है कि तरक्की की राह कच्ची हो गई।


साहूजी मुझे सांत्वना देते हुए बोले- पहले तो आप १ अप्रैल का मोह त्यागिए। भई ये मूर्ख दिवस अब १ अप्रैल को नहीं, सालभर बनाया जाता है। अब देखिए कुछ दिनों पहले सरकार बोल रही थी पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ेंगे, फिर अचानक बढ़ा दिए और हमको इंस्टेंट (क्षणिक) मूर्ख बनाया गया। अब अपने प्रधानमंत्रीजी को ही लीजिए। पहले कार्यकाल में उनको गठबंधन सरकार की ऐसी गाड़ी चलाने मिली जिसके टायर पंक्चर थे, इंजन खराब था, पेट्रोल भरवाने वाली सहयोगी पार्टियां अकड़ दिखाती थी। वह कार्यकाल तो जैसे-तैसे चला, यह कार्यकाल तो उससे भी बढ़कर है। इस बार तो बड़े-बड़े घोटाले हुए। घोटाला कोई और करता है इस्तीफे की मांग इनकी उठने लगती है। घोटाला करने वाले खुश पर माथे पर शिकन इनके। मनमोहनजी को तो 8 सालों से अप्रैल फूल बनाया जा रहा है। पर मनमोहनजी भी कम नहीं। इधर जब अन्ना लोकपाल का टोल प्लाजा बनाकर सड़क पर खड़े हो गए और टोल के रूप में लोकपाल बिल मांगने लगे तो मनमोहन जी अन्ना को जोकपाल पकड़ाकर गच्चा देकर भाग गए और अन्ना को फूल बना गए।  दूसरी ओर बाबा रामदेव के अनशन के दौरान पुलिस ने पहले कहा लाठीचार्ज नहीं करेंगे और फिर जनता को मूर्ख बनाते हुए रात को लाठीचार्ज कर दिया। इधर रामदेव भी अपने लंबे बालों का फायदा उठाकर झट लड़की का रूप धरकर पुलिस को मूर्ख बनाकर भाग निकले।


साहूजी आगे बोले- दरअसल बंधु ये पूरा मूर्ख चक्र है। सब एक-दूसरे को मूर्ख बना रहे है। आप चाहे आम जनता रहें या नेता मूर्ख बनने से बच नहीं पाएंगे। मूर्खता एक धर्मनिरपेक्ष भावना है जो सब में बराबरी से समाई हुई है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, हम सब मूरख भाई-भाई। पहला दूसरे को मूर्ख बनाता है, दूसरे तीसरे को, तीसरा चौथे को और चौथा पहले को। आप और हम भी इसी चक्र के स्टॉपेज प्वाइंट हैं। हमारे आफके बिना ये चक्र पूरा नहीं होता। पिछले दिनों ही मैं मूर्ख बना था।  दूध में पानी मिलाना तो अब अनिवार्य हो गया है,  पर मेरे दूधवाले ने मुझे शुद्ध दूध पिलाकर मूर्ख बना दिया और बदहजमी करा गया। तब से ऐसी हालत हो गई है कि दूध का जला हूं, चाय भी पानी डाल-डालकर पी रहा हूं।


कभी नेता जनता को मूर्ख बनाते हैं, कभी जनता नेता को। नेताजी जितनी गति से वादे करते हैं और उतनी ही गति से भूलते भी जाते हैं। जनता भी चपल हो गई है, शराब इससे लेती है, कंबल उससे और वोट किसी तीसरे को दे देती है। नेता नेता को भी मूर्ख बना रहे हैं, सांप के डसने से सांप भी मर रहे हैं। गठबंधन का वादा किसी के साथ करते हैं, और जाकर किसी दूसरे से मिल जाते हैं। एक बार मैंने भी अपने यहां के दागी नेता को मूर्ख बनाने की कोशिश की, पर सफल न हो पाया। चुनाव में खड़े दोनों उम्मीदवार सांपनाथ और नागनाथ थे। मैंने दोनों को ही वोट नहीं दिया। लेकिन बाकी लोगों ने सांपनाथ को जीता दिया, करते भी क्या ऑप्शन ही नहीं था जनता बेचारी मूर्ख बन गई। खैर ये सब छोड़िए, आप क्या बोल रहे थे सुमितजी कि आपने कभी किसी को मूर्ख नहीं बनाया। कल ही मुझे अपनी बिना पेट्रोल वाली मोटरसायकिल पकड़ाकर मूर्ख बनाया। साहूजी के इतना कहते ही मैं मुस्कुराया। उन्होंने आगे मेरे द्वारा मूर्ख बनाने के किस्से जारी रखें जिससे मेरी मुस्कान और बढ़ती गई। मुस्कुराते मुस्कूराते होठों का फैलाव इतना हो गया कि वे दुखने लगे। पर होठों के दर्द पर तारीफों का मरहम काम कर रहा ता। इधर होठों के बीच से झांकते दातों के बीच मच्छों को घुसपैठ का रास्ता दिखाई दे रहा था…..।


साहूजी आगे बोले- सबसे बड़ा मूर्ख तो मैं हूं जो आज आफिस जाने के बजाए 1 घंटा आपके साथ खराब कर बैठा। इतनी तारीफ सुनने के बाद मेरा फर्ज बनता था कि मैं उनको आफिस छोडूं।  मैंने साहूजी को आफिस छो़ड़ने की पेशकश की और उनके साथ बाहर आ गया। तभी साहूजी- जोर से चिल्लाए। अप्रैल फूल बनाया, हमको मजा आया। आज तो संडे है, संडे को कोई आफिस जाता है भला। मेरे चेहरे पर चस्पी लंबी सी मुस्कान तुरंत उतर गई। घुसपैठ की उम्मीद में आगे बढ़ रहे मच्छऱ निराश होकर लौट गए। मैं भी वापस अपने कमरे में लौट आया और फिर लिखने लगा…… “आवश्यकता है मूर्खों की…..”।

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355 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madhur Bhardwaj के द्वारा
April 3, 2012

भाई सुमित जी नमस्कार, सच में मज़ा आ गया, हँसते-हँसते पेट में दर्द हो गया, वाकई आपने अपने व्यंग में कटु सत्य लिखा है! और फिर इससे बड़ा हमारी मूर्खता का प्रमाण और क्या होगा कि हम जानते हैं कि हमें मूर्ख बनाया जा रहा है फिर भी हम बच नहीं सकते और मूर्ख बनकर मुस्कराते हैं! वैसे योगी जी से मैं सहमत हूँ कि आपको ऊपर ही लिख देना चाहिए था कि हँसना मना है, इस व्यंग का नाम ही अगर “हँसना मना है” रखते तो भी चलता! अति उत्तम व्यंग रचना के लिए मेरी तरफ से बधाई स्वीकार करें!

    sumityadav के द्वारा
    April 3, 2012

    आपके द्वारा प्रशंसा पाकर मेरा यह प्रयास सफल हुआ मधुरजी। क्या करें जमाने का चलन देखकर दुख भी होता है कि लोग किस प्रकार खुशी खुशी मूर्ख बनते हैं। अब हिंदी को ही लें। हिंदी बोलने में आजकल बहुतों को ऐसे शरम आती है जैसे कोई महापाप कर दिया हो और अंग्रेजी को बड़ी शान से बोलते हैं। क्या इतना भी पता कि जो अपनी मातृभाषा की इज्जत नहीं करते उनसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। एक अंग्रेज बड़ी शान से अंग्रेजी बोलता है, चीनी चीनी भाषा बोलता है, फ्रेंच व्यक्ति फ्रेंच बोलता है क्योंकि यह उनकी मातृभाषा है। लेकिन हिन्दुस्तानी हिन्दी बोलने से पहले सोचते हैं,,,,, इससे बड़ी मर्खता का प्रमाण क्या होगा। उदाहरण अनंत हैं…. इन्हें किसी और व्यंग्य में सामने लाऊंगा। आपका आभार।

rekhafbd के द्वारा
April 2, 2012

सुमित जी ,बढ़िया व्यंग के लिए बधाई ,मूर्ख दिवस अब १अप्रेल को नहीं पूरा साल बनाया जाता है |बहुत खूब

    sumityadav के द्वारा
    April 2, 2012

    व्यंग्य को पसंद करने के लिए आपका आभार रेखाजी। मूर्ख दिवस तो साल भर रहता है, जो लोग सोचते हैं कि यह मात्र १ अप्रैल को रहता है वे खुद को मूर्ख बना रहे हैं…..। भ्रम से निकलना जरुरी है….

yogi sarswat के द्वारा
April 2, 2012

भाई सुमित जी नमस्कार ! एक शिकायत है मित्रवर आपसे ! आपको पहले ही लिख देना चाहिए था की हँसना मन है ! हहहाआआआ जब इतना बढ़िया लेख दिया है तो हंसी तो आएगी ही ! मस्त व्यंग्य है भाई !

    sumityadav के द्वारा
    April 2, 2012

    योगी भाई जी नमस्काऱ। अगर ये आपकी शिकायत है, तो मैं चाहूंगा आपकी ये शिकायत हमेशा रहे। आप भाईयों के लिए ही तो लिखते हैं हम। बस आपके प्रोत्साहन से ही ठीक-ठाक लिख रहा हूं। धन्यवाद स्वीकार करें।

    Missy के द्वारा
    July 26, 2016

    I personally have embraced the new tecnhologies and the CMS platforms, I think the new tools only make the web designs better. I am glad that new technologies are coming out in web design that make things easier, improved, and better looking for design.

dineshaastik के द्वारा
April 2, 2012

व्यंगात्मक  आलेख  की प्रस्तुति के लिये बधाई…

    sumityadav के द्वारा
    April 2, 2012

    मेरे प्रयास को सराहने के लिए धन्यवाद दिनेश जी।

April 1, 2012

सार्थक और अर्थपूर्ण….हास्य-व्यंग्य आलेख …..हार्दिक आभार.

    sumityadav के द्वारा
    April 2, 2012

    व्यंग्य को पसंद करने के लिए आपका आभार अनिल जी, आगे भी प्रयास जारी रहेगा।

चन्दन राय के द्वारा
April 1, 2012

sumityadav आवश्यकता है मूर्खों की, मित्र भाई आप इस हफ्ता मेरी नज़र मe Blogger of the week hain, guru jha gaye

    sumityadav के द्वारा
    April 2, 2012

    मित्र चंदनजी, आपने मेरे व्यंग्य को इतना पसंद किया बस वही काफी है मेरे उत्साहवर्धन के लिए। आप जैसे मित्र भाईयों का साथ मिलेगा तो जरुर छाएंगे….. हा.. हा.. हा…।


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