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मेरे पास आओ मेरे दोस्तों, एक किस्सा सुनाऊं...

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मध्यम कुमार ‘मध्यस्थ’

Posted On 26 Apr, 2012 में

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mediationमध्यम कुमार बेतहाशा दौड़े जा रहे थे, उन्हें इस तरह भागता देख लग रहा था मानो वे फर्राटा धावक का 100 मीटर का रिकार्ड तोड़ देंगे। वैसे तो इस देश में सब भाग ही रहे हैं- नेता अपने वादों से, अधिकारी अपने काम से, जनता अपने कर्तव्यों से, परिवारवाले बेटियों से भाग रहे हैं, कोई घोटाला करके भाग रहा है, तो कोई घोटाला करने के लिए भाग रहा है। इतने भागदौड़ वाला देश भी जब ओलम्पिक दौड़ में मेडल नहीं ला पाता है, तो बड़ा अचरज होता है। खैर यह सब तो चिंतनीय बातें है, लेकिन अभी हम चिंतक नहीं ईष्र्यालु मूड में हैं और मध्यम कुमार हमारी आंखों के सामने दौडऩे का रिकार्ड बना दे, ऐसा कतई नहीं हो सकता। उनके इस दौड़ में व्यवधान उपस्थित करने हम भी उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगे। हमने उन्हें आवाज दी। हमारी आवाज सुनकर उन्होंने अपनी स्पीड धीमी की, हमें थोड़ी खुशी मिली। हमने पूछा- कहां भागे जा रहे हो मध्यम कुमार। पर वे हमारी बात को अनसुना कर फिर भागने लगे। पर अपनी ढीठ प्रवृत्ति के अनुरूप हमने भागते हुए फिर पूछा- कहा जा रहे हो। इस बार मध्यम कुमार रुके और बोले- आज हमें मत रोकिए। आज हम अपना कौशल दिखाकर रहेंगे। आज हमारे मोहल्ले में दो पक्षों का विवाद हो गया है। और जब-जब भी ऐसे विवाद होते हैं, तब-तब जरुरत पड़ती है एक मध्यस्थ की, और वो हैं हम।


मैंने आश्चर्य से पूछा- आप और मध्यस्थ? मध्यमकुमार जी मामला साफ करते हुए बोले- आप तो हमेशा हमें नजरअंदाज ही कर देते हैं। अजी, हम तो पैदाइशी मध्सस्थ हैं, एकदम खालिस। एक तो हम मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। तीन भाईयों में हम मंझले हैं। हमारी शादी  के समय जब हम लड़की देखने गए तब तीन बहनों में हमें छोटी लड़की पसंद थी. पर परिवार वाले हमारी शादी बड़ी लड़की से कराना चाहते थे। बड़ी विकट घड़ी थी, विवाद की स्थिति भी बन रही थी, लगा जैसे जुड़ता हुआ रिश्ता टूट जाएगा । ऐसा लग रहा था जैसे मारा तो बल्ले से छक्का था, लेकिन बाउंड्री लाइन पर लपक लिए जाएंगे। ऐसे संकटपूर्ण स्थिति में अवतरित हुए मध्यम कुमार यानी कि हम। हमने तय किया कि हम मंझली लड़की से विवाह करें। सब मान गए और हो गया हैप्पी एंडिंग। बस तब से हमने अपने कौशल को भांपते हुए और जनता की मांग पर अपने नाम के आगे मध्यस्थ उपनाम जोड़ लिया और हम हो गए मध्यम कुमार ‘मध्यस्थÓ। तो ये थी मध्यम कुमार ‘मध्यस्थÓ के अवतरण की छोटी सी कथा।


हम मध्यम कुमार को टोकते हुए बोले कि जनता ने कब आपसे मांग की कि आप ‘मध्यस्थ’  उपनाम जोडि़ए। वे समझाते हुए बोले- देखिए सुमितजी, ये सब भावनाओं का खेल है। जनता साफ-साफ कुछ नहीं कहती, बस आपको उसका मन पढऩा आना चाहिए। मौका देख चौका मारिए और खुद को उन पर थोप दीजिए, जनता झेल लेगी। जैसे नेता चुनने का हक हमको नहीं है., बस जो चुनके सामने रख दिए गए हैं उनको वोट देकर जीता दो, यही काम है। देखिए अब कहीं भी झगड़ा होगा तो हम भी अपनी मध्यस्थता थोप देंगे। हम उनकी मध्यस्थता एक्सप्रेस को रोकते हुए बोले- मतलब मध्यस्थ वह होता है जो दूसरे के फटे में जबरन टांग अड़ाए। मध्यमकुमार खीझते हुए बोले- नहीं, नहीं। मध्यस्थ वह होता है जो उस फटे की सिलाई करे, बिलकुल दर्जी की तरह।

मध्यम कुमार आगे बोले- मध्यस्थों का माखौल उड़ाने से पहले सुमितजी, इतिहास उठा कर देख लीजिए।  जितनी भी बड़ी लड़ाईयां हुई हैं, वे सब नहीं हुई होती, अगर उस समय हमारी श्रेणी व हमारी क्षमता का कोई मध्यस्थ वहां होता। पर यह तो नसीब का खेल है। ये तो इस युग की खुशकिस्मती है कि हम जैसे आला दर्जे के मध्यस्थ ने इस युग में जन्म लिया है। हमने आगे मध्यम कुमार से पूछा-, हम आपका माखौल नहीं उड़ा रहे लेकिन पिछली बार आप दो लोगों के विवाद में बिना बुलाए पहुंच गए थे मध्यस्थता करने। उस समय दोनों ही पक्षों ने आपको मध्यस्थ बनाने से इंकार कर दिया था, तब क्या आपके आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुंच थी। मध्यम कुमार बोले- देखिए, हमें ठेस नहीं पहुंची, बल्कि हमने इसे एक और मौके के रूप में लिया है। क्योंकि अभी इनका विवाद अस्थायी तौर पर निपटा है, अगली बार जब इनका विवाद होगा तब इन्हें हम ही याद आएंगे, और तब हम दिखाएंगे अपना जलवा। हम तो परमानेंट मामला सुलझाने वालों में से है।


मध्यमकुमार आगे बोले- हमें न लडऩा-झगडऩा पसंद है, न हम आपकी तरह तटस्थ रह सकते हैं, हमें तो बस मध्यस्थता करना पसंद है, और इसमे तो हम उस्ताद हैं। ये बीत दीगर है कि हमें कभी अपनी उस्तादी दिखाने का कोई बड़ा मौका नहीं मिला। पर आज मोहल्ले में बड़ा विवाद हुआ है। और इस विवाद को सुुलझाने के बाद हमें मध्यस्थ शिरोमणि की उपाधि जरुर मिल जाएगी। धत्त तेरी की, आप जैसे तटस्थ से बात करने के चक्कर में कहीं हम मध्यस्थता करने का मौका न गंवा दें। जल्दी दौडि़ए इससे पहले कि कोई और मध्यस्थ बीच ममें कूदकर मामला सुलझा दे। मध्यम कुमार जी फिर फर्राटा गति से दौड़ लगाकर कर चल दिए। हम भी मजबूर देश के मजबूर नागरिक की तरह उनके पीछे-पीछे चल दिए। विवाद वाली जगह पर पहुंचकर जो नजारा मध्यम कुमार ने देखा, उसके बाद उनको काटो तो खून नहीं। किसी दूसरे मध्यस्थ ने आकर मामला पहले ही सुलझा दिया था। विवादित पक्षों में मिलने-मिलने का कार्यक्रम चल रहा था। मध्यम कुमार की हालत ऐसी हो गई थी, जैसे शादी उनकी हो और दुल्हन से फेरे कोई और ले बैठा।


मध्यम कुमार का चेहरा हताश, निराश और देवदास सरीखा हो गया था। मौके की गमगीनी को देख मैंने तुरंत एक शायरी दे मारी कि-

मोहब्बत का अंजाम देख्र डर रहे हो,

निगाहों में अपनी लहू भर रहे हो,

तेरी प्रेमिका ले उड़ा और कोई

इक तुम हो कि मातम मना रहे हैं

इतना सुनते ही मध्यम कुमार अब दीर्घ होते हुए मेरे पास आए। उनके अंदर का गुस्सा खौल रहा था और वे उबलते हुए बोले- सब तुम्हारे कारण हैं। तुमने हमारा समय खराब किया और हमने मध्यस्थता करने का एक अदद मौका खो दिया। इतना सुन मैंने भी अपने पैने-पैने शब्दबाण उन पर छोड़े। अब हम दोनों में विवाद हो रहा है और हमें जरुरत है एक मध्यस्थ की। हे ‘मध्यस्थ’ प्रकट भव:।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

RAHUL YADAV के द्वारा
April 27, 2012

सुमित जी …..नमस्कार सुंदर व्यंग प्रस्त ुत किया आपने ……मध्यस्थ जी को बोलिये कि छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के अगवा किये गये डीएम(एलेक्स पाल) को छुड़ाने के लिए सरकार एक मध्यस्थ की तलाश कर रहीं है। शायद इस कार्य से वह अपनी योग्यता साबित कर सकें…..लेकिन यह काम भी इतना आसान नहीं है क्यांेकि मध्यस्थता माओवादियों के साथ करनी है।

    sumityadav के द्वारा
    April 30, 2012

    वो तो है राहुलजी। मध्यस्थता किसी भी करनी हो, कभी आसान नहीं रहती।

krishnashri के द्वारा
April 27, 2012

स्नेही सुमित जी , सादर , आपके व्यंग लेख बड़े चुटीले होते हैं उसी की एक कड़ी यह भी है , हंसाता गुदगुदाता व्यंग . बहुत बहुत धन्यवाद .

    sumityadav के द्वारा
    April 30, 2012

    प्रणाम कृष्णाजी। व्यंग्य को पसंद करने के लिए आपका सादर धन्यवाद। देश के हालात पर चुटकी लेना ही पड़ता है… और आप लोगों को प्रोत्साहन इस चुटकी को और ध्वनि प्रदान कर देते हैं…

चन्दन राय के द्वारा
April 27, 2012

सुमित भाई , में आपकी लेखनी का कायल हूँ , आप की सोच को मेरा सलाम

    sumityadav के द्वारा
    April 30, 2012

    सब आपका प्यार है चंदनभाई। इसलिए ठीक-ठाक लिख पा रहा हूं। सदा प्रोत्साहन करने के लिए धन्यवाद।

Mohinder Kumar के द्वारा
April 26, 2012

सुमित जी, भारतीय कोक्रोचों की कथा सुनी थी जो किसी को अपनी दुनिया से बाहर नहीं जाने देते, कोई कोशिश भी करता है तो उसकी टांग खेंच कर दौबारा वहीं ले आते हैं जहां से वो चला था. और ऐसे में कोई मध्यस्त क्यों अपनी टांग तुडवाना चाहेगा…. सो आप तो अपने आप ही निपट लो… हम निकलते हैं पतली गली से.

    sumityadav के द्वारा
    April 30, 2012

    सब पतली गली से निकले जा रहे हैं… और हम यहां लड़-लड़कर पतले हए जा रहे हैं।….. बचा लीजिए मोहिंदरजी। हा…हा…हा….। व्यंग्य को पसंद करने के लिए धन्यवाद।


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